Saturday, 21 May 2011

विषपान




अहिल्या-सहगामिनी होने के नाते
पति की इच्छा का सम्मान करना
तुम्हारा धर्म था
पर उनमें आये
अनायास परिवर्तन को
पहचानना भी तो
तुम्हारा कर्म था
कठपुतली न बन
अपने विवेक का
किया होता उपयोग
अपने आसपास
घटी घटनाओं का
रखा होता ध्यान
तो असली-नकली
सही-गलत की
शीघ्र हो जाती पहचान
गौतम ऋषि की कुटिया
न पडी होती यूँ सुनसान औ विरान
 न हीं पत्थर की प्रतिमा बन
पल-पल करना पडता
व्यथा और ग्लानी का
पति से वियोग का
असहनीय अपमान का
सदियों तक विषपान।

यूँ न गँवाया होता


गाँधारी-अगर तुमने अपने बच्चों के
लालन-पालन में  पति का
हाथ बँटाया होता तो
अपने सौ पुत्रों के साथ
कौरव वंश को यूँ न
गँवाया होता ।
माना कि तुम महारानी थी
कुंती की जेठानी थी
पर नारी होने के नाते
नारी के मन के दर्द को
समझा होता
तो अपने सौ पुत्रों के साथ
कौरव वंश को यूँ न गँवाया होता।
धृतराष्ट्र तो अँधे थे
पुत्र-मोह में बँधे थे
पति की आखें बनकर
पत्नि धर्म निभाया होता
तो अपने सौ पुत्रों के साथ
कौरव वंश को यूँ न गँवाया होता।
कर पाती खुद को बदले की भावना से मुक्त
शकुनि को टेढी चाल चलने से रोका होता
तो अपने सौ पुत्रों के साथ अपने भाई
और कौरव वंश को यूँ न गँवाया होता।

Thursday, 19 May 2011

मैं


               १

हवा हूँ, मैं बहूँगी!
लाख, कोशिश करे कोई
बहना नहीं छौडूँगी
जब-जब जहाँ-जहाँ जाना है
जाकर रहूँगी
बहना मेरा काम है
बहती रहूँगी।
             २
ज्वाला हूँ, मैं जलूँगी
जितने भी अरमान हैं मेरे 
पूरा करके रहूँगी
न गलत किया है
न गलत करने दूँगी
भले ही कोशिश करे कोई
खुद को बुझने न दूँगी।         

            ३
धरती हूँ मैँ सहूँगी
दिल में भले दर्द हो
पर जुबाँ से नही कहूँगी
लहलहाती आई हूँ
लहलहाती रहूँगी।  
  
         ४
नदी हूँ मैं अनवरत
आगे बढती जाऊँगी
राह की बाधाओं से
कभी नही घबराऊँगी
आगे बढती आई हूँ
आगे बढती जाऊँगी।







दीवाली

असत्य पर सत्य का
प्रकाश का अँधकार पर
अच्छाई का बुराई पर
विजय प्रतीक है
दीवाली
दीपों की कतार से
देती हमें संदेश दीवाली
संभव सब कुछ हो सकता है
गर नीयत हो साफ
तुम्हारा
बँधे रहे हम स्नेह-डोर से
मूल-मंत्र है भाईचारा।

Wednesday, 18 May 2011

मैंने देखा है

मैंने देखा है
हँसतों को रोते हुए
मैंने देखा है
जिन्दों को मरते हुए
बहुत दुखदाई है
पल-पल का मरना
पर इस बात से भला क्या डरना!

अकेले आये हैं
अकेले है जाना
साथ तो किसी का है
केवल बहाना
नदी अकेली चलती है
पता नही गंतव्य कहाँ है ?
पथ में काँटे लाख बिछे हो
ओ राही तुम गम मत करना
पडे वक्त अगर कभी तो ?


हिम्मत से समझौता करना
मैंने देखा है
तारों को टूटते हुये
मैंने देखा है
तरुवर को सूखते हुये
चाहे कितने तारे टूटे
व्योम नही घबराता
खडा तना वह
मही के ऊपर
मन ही मन मुस्काता
पतझड के जाते ही
जब आयंगे मौसम
बहार के
नव पल्लव प्रसून खिलेंगे
हरियाली भी होगी
कृत संकल्प हो
बढो बटोही
तेरी ही जय होगी।

Monday, 16 May 2011

मौन


आसमान में छिडी लडाई
चंदा और तारों में
तारे बोले-सुन चंदा तुम
व्यर्थ क्यों इतराते हो ?
रोज-रोज तुम रुप बदलते
कुछ दिन तुम छिप जाते हो
छिपना मेरी हार नही है
छिपना मेरी जीत है
सब दिन होत न एक समान
ये जीवन की रीत है
 गर तुम पालन करते इसका
कभी नही झल्लाते
व्यर्थ नही अभिमानी बनते
यूँ ही टूट न जाते
क्रोध वैर से नाता जोडूँ
मुझको नही मंजूर है
शीतलता प्रदान करुँ
खुशी मुझमें भरपूर है
चंदा की चांदनी को
ताना मारे कौन
जबाव नही सूझा तारों को
साध लिया सबने ही मौन।

प्रतिरोध


द्रोपदी-अगर तुमने शुरु से ही
अन्याय का प्रतिरोध किया होता
तो जो-जो तुम्हारे साथ हुआ
वो न हुआ होता
नारी थीं तुम ममतामयी,स्नेहमयी औ-
त्यागमयी,कोई वस्तु नही
जो पाँच भागों में बाँट दी गयीं
क्यों-क्यों-क्यों ?
तुमने ऐसा क्यों सहा ?
भले ही गलत था,दुर्योधन पर-
ऐसा क्यों कहा कि "अंधे का बेटा अंधा ही होता है"
जो जैसा बोता है वो वैसा ही काटता है
प्रकृति के न्याय में ऐसा ही होता है
दुर्योधन अगर दोषी है तो दोष तुंम्हारा भी कम नही
बडों का अपमान करना ये हमारा धर्म नही
हाँ-दोषी को उनकी गलतियों का आईना दिखाना भी जरुरी है
पर बुरे के साथ बुरा बन जाना ये कैसी मजबूरी है
कौरव तो पर्याय था झूठ और फरेब का
पर क्या ? पाँडवों के हमेशा उचित व्यवहार थे
किसी के उकसाने पर जो मर्यादा को भूल जाता है
निर्जीव वस्तुओं के समान पत्नि की जुए में
बाजी लगाता है
माँ के वचन की आड ले जो
नारी की अस्मिता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है
वो क्या ? कौरव से अलग पंक्ति में खडा रह पाता है?
वो,तो कौरव से भी बडा अपराधी है
जो उसे अपराध करने के नये-नये तरीके
आजमाने का नुस्खा देता हैअपनी विन्रमता की आड ले जो
अपराधों को बढावा देता है
अन्याय करना और अन्याय सहना दोनों
ही अपराध है
कौरव अगर अपराधी है
तो पांडव भी दूध का धुला नही है
और सबसे बडी बात तो यह है कि
असली बात सबके समझ में आती है
कि पाँच पतियों की टुकडी भी
द्रोपदी को नही बचा पाती है
उसकी लाज बची उसकी
खुद की भक्ति और शक्ति से
काश-तुमने शुरु में ही लिया होता
इसका सहारा तो इतनी भरी सभा में
न रहती यूँ लाचार और बेसहारा।