Sunday, 7 September 2014
Monday, 18 August 2014
क्यों ?
जिन राहों को छोड़ दिया है
उन राहों पे जाना क्यों ?
सूखा बादल ,प्यासी धरती
सूरज को मनाना क्यों ?
जिन आँखों से अश्क न निकले
उन आँखों को रुलाना क्यों ?
समझ से भरे नासमझों को
बेवजह समझाना क्यों ?
दौलत से जो स्नेह को तौले
उन्हें स्नेह के बोल सिखाना क्यों ?
चाँद -तारों से भरी निशा को
सन्नाटे से मिलवाना क्यों ?
सभी समय की बर्बादी है।
उन राहों पे जाना क्यों ?
सूखा बादल ,प्यासी धरती
सूरज को मनाना क्यों ?
जिन आँखों से अश्क न निकले
उन आँखों को रुलाना क्यों ?
समझ से भरे नासमझों को
बेवजह समझाना क्यों ?
दौलत से जो स्नेह को तौले
उन्हें स्नेह के बोल सिखाना क्यों ?
चाँद -तारों से भरी निशा को
सन्नाटे से मिलवाना क्यों ?
सभी समय की बर्बादी है।
Monday, 28 July 2014
Tuesday, 20 May 2014
ऐ दिल.… तूँ चल
ईंट पत्थर जोड़ रहे हैं धड़कते दिलों को तोड़ रहे हैं
सुन पा रहे नहीं
अपनों की चित्कार
ऐसे अपनों को
अपना समझने की
हसरत है बेकार ---
झूठा साक्षी बना है सत्य का
निशा उम्मीद की रश्मियाँ बो रही है
रावण -कंसों की दुनियाँ में
मानवीय संवेदनाएं खो रही है ----
महसुस नहीं हो पा रहे जहाँ
माँ-जाई को माँ-जाई के
कातरता भरे सिसकते अरमान
ऐसी निर्ममता तो है केवल
एक कसाई की पहचान ----
ऐसे कसाई के लिए रोना क्यों ?
उम्मीद की किरणें बोना क्यों ?
ऐ दिल.… तूँ चल
तूँ अकेला हीं चल
भीड़ में खोने से अच्छा है
निर्जन में खोना
बेफिक्री की दुनियाँ में
चैन से सोना----
Sunday, 6 April 2014
Thursday, 20 March 2014
Friday, 21 February 2014
बोलो बसंत
उजड़े को सँवारते हो नाउम्मीदी से भरे दिलों में
उम्मीद की किरण जगाते हो.… इसीलिए,,,
बसंत--- तुम..... ऋतुराज कहलाते हो.....
यहाँ-वहाँ सारे जहाँ में
छोटे-बड़े का भेद किये बिना
गुलशन को महकाते हो..... इसीलिए ,,,,
बसंत ---तुम.… ऋतुराज कहलाते हो.…
माँ शारदे का प्रसाद
होली का अल्हड आह्लाद
झोली में लेकर आते हो..... इसीलिये,,,,
बसंत ---तुम.…ऋतुराज कहलाते हो.…
गाँव शहर हर गली की बिटिया
निर्भय जीवन जी पाये
कोई भी दुष्कर्मी उसके
अस्मत / भावनाओं से खेल न पाये
फिज़ा में ये रंग कब-तक बिखराओगे
उसी बसंत का इन्तजार है
बोलो बसंत ! कब आओगे ?
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