Tuesday, 20 May 2014

ऐ दिल.… तूँ चल

ईंट पत्थर जोड़ रहे हैं 
धड़कते दिलों को तोड़ रहे हैं 
सुन पा रहे नहीं 
अपनों की चित्कार 
ऐसे अपनों को
 अपना समझने की 
हसरत है बेकार ---

झूठा साक्षी बना है सत्य का 

निशा उम्मीद की रश्मियाँ बो रही है 
रावण -कंसों की दुनियाँ में 
मानवीय संवेदनाएं खो रही है ----

महसुस नहीं हो पा रहे जहाँ 

माँ-जाई को माँ-जाई के 
कातरता भरे सिसकते अरमान 
ऐसी निर्ममता तो है केवल 
एक कसाई की पहचान ----

ऐसे कसाई के लिए रोना क्यों ?
उम्मीद की किरणें बोना क्यों ?

ऐ दिल.… तूँ चल 

तूँ अकेला हीं चल 
भीड़ में खोने से अच्छा है 
निर्जन में खोना
 बेफिक्री की दुनियाँ में 
चैन से सोना---- 

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (21-05-2014) को "रविकर का प्रणाम" (चर्चा मंच 1619) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी .

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  2. बहुत उम्दा .... मन का हौसला और सकारात्मक सोच कायम रहे

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  3. निर्जन जाओगे, तो वहाँ खुद को पाओगे! यानि निर्जन एक कोरी कल्पना है...बहुत बढ़िया।

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    1. बिल्कुल सही बात कही आपने सर ......

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  4. वाह, मन को संबल देती रचना।

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  5. चलना ही जीवन सत्य है .. चाहे एक्ला ही क्यों न ...

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  6. झूठा साक्षी बना है सत्य का
    निशा उम्मीद की रश्मियाँ बो रही है
    रावण -कंसों की दुनियाँ में
    मानवीय संवेदनाएं खो रही है ----

    बढ़िया सामाजिक शब्द चित्र और विभेदन

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  7. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 7 जुलाई 2016 को में शामिल किया गया है।
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

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  8. बहुत सुन्दर ..

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