Saturday, 31 March 2012

विरह -गीत

दिल को लगी ठेस 
आँखें सह नही पाई 
सामने आये तुम जब ????/
कुछ कह नही पाई.......



आघात दर आघात मैं 
सहती चली गई 
कह न सकी जो बोलकर 
इक चुप्पी कह गई .......


उर के उजड़े उपवन में 
कोयल गाती नहीं है ..
याद तुम्हारी चाह के भी 
जाती नहीं है ........

इन्द्रधनुषी झूले हैं औ 
झिलमिल सी डोरी 
कैसे मिलूं प्रियतम से ..ये...
सोच रही गोरी .....

विरह भरे दिन बीत गये 
बीत गई कितनी ही रातें 
भींगा नही है तन मन अब तक .....
बीत गईं कितनी बरसातें .....
 
.
 

42 comments:

  1. इंतज़ार की घड़ियाँ और विरह...बहुत सुन्दर रचना!

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  2. (१) वाह
    गजब अभिव्यक्ति |

    २) मौन की अभिव्यक्ति इकदम सटीक |

    ३) बिलकुल सही

    ४) बस प्रीत की डोर

    ५) विरह की पराकाष्ठा

    बधाई महोदया |

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  3. आघात दर आघात मैं
    सहती चली गई
    कह न सकी जो बोलकर
    इक चुप्पी कह गई .......

    बहुत सुन्दर निशा जी.....
    मन को छू गयी...

    सस्नेह

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  4. विरह भरे दिन बीत गये
    बीत गई कितनी ही रातें
    भींगा नही है तन मन अब तक,
    बीत गईं कितनी बरसातें .....
    बहुत सुंदर भाव की पंक्तियाँ,...अच्छी प्रस्तुति

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  5. बहुत ही गहरी वेदना ...
    सुंदर अभिव्यक्ति ...!

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  6. विरह भरे दिन बीत गये
    बीत गई कितनी ही रातें
    भींगा नही है तन मन अब तक
    बीत गईं कितनी बरसातें

    सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  7. विरह वेदना की सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  8. वेदना की सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  9. दर्द की दोनों अनुभूति है। एक वह जो गहरे तक भिंगोता है। दूसरा वह जो भींगते-भींगते सूख जाता है।

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  10. गहरी अभिव्यक्ति.....प्रशंसनीय प्रस्तुति....!

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  11. उर के उजड़े उपवन में
    कोयल गाती नहीं है ..
    याद तुम्हारी चाह के भी
    जाती नहीं है ........

    मन की अनुभूतियों का सुंदर चित्रण।

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 02-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

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  13. विरह भरे दिन बीत गये
    बीत गई कितनी ही रातें
    भींगा नही है तन मन अब तक .....
    बीत गईं कितनी बरसातें .....

    विरह की अग्नि कोई बूँद कोई नमी टिकने ही नहीं देती ... बहुत लाजवाब रचना ...

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  14. विरह की स्थिति ... और वही अवस्था ... गहरे ढंग से व्यक्त किया है

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  15. विरह का दर्द ..सुंदर अभिव्यक्ति के लिए आभार .

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  16. मर्मस्पर्शी रचना !

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  17. कथ्यांश के मुताबिक भाव व शब्द चयन उत्कृष्ट हैं सफल सृजन ...बधाईयाँ जी /

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  18. इन्द्रधनुषी झूले हैं औ
    झिलमिल सी डोरी
    कैसे मिलूं प्रियतम से ..ये...
    सोच रही गोरी .....
    विरह वेदना की बहु विध अभिव्यक्ति ,नीड़ का निर्माण अब न हो सकेगा .

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  19. दिल को लगी ठेस
    आँखें सह नही पाई
    सामने आये तुम जब
    कुछ कह नही पाई.......

    बहुत सुन्दर !

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  20. क्या बात है,
    बहुत सुंदर

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  21. उर के उजड़े उपवन में
    कोयल गाती नहीं है ..
    याद तुम्हारी चाह के भी
    जाती नहीं है ........

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति....
    सादर।

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  22. आघात दर आघात मैं
    सहती चली गई
    कह न सकी जो बोलकर
    इक चुप्पी कह गई .......

    wah bahut hi sundar ...bilkul lajabab rachana Nisha ji.

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  23. https://www.facebook.com/Hindiblogger

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  24. मौन में वो शक्ति है , जो शव्द में नहीं ! विरह की अकुलाहट ! सुन्दर वेदना !

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  25. इन्द्रधनुषी झूले हैं औ
    झिलमिल सी डोरी
    कैसे मिलूं प्रियतम से ..ये...
    सोच रही गोरी .....!
    बेहतर ....!

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  26. वाह! बहुत बढिया शब्द चित्र खींचा है आपने……… आभार

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  27. मार्मिक रचना ...बहुत सुन्दर मन तक पहुची

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  28. हृदयस्पर्शी भावुक प्रस्तुति.
    आपकी हर प्रस्तुति भावनाओं के ज्वार
    को शिखर पर ले जाती प्रतीत होती है.
    आपके भावुक हृदय को नमन.

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  29. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  30. विरह के भाव को पूरे दर्द के साथ कह-कह जाती कविता. बहुत खूब.

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