Wednesday, 11 September 2013

तुम्हीं दर्द हो दवा तुम्हीं हो

जीवन पथ पे चला अकेला 
छोड़ दुनिया का झूठा मेला 
सहम गए क्यों ?

वास्तविकताओं से सामना हुआ ज्योंहि 

आगे खड़ी है मंज़िल तेरी 
हिम्मत कर लो ओ बटोही,…

चहूँ ओर उदासी थी 
कलियाँ-कलियाँ प्यासी थी 
प्रकृति भी स्व-दुःख से कातर होकर 
बीज तम के बो रही थी …

तम से निखरी निशा उन्हें 
ओस की बूँदों से भिगो रही थी----

देखो ! दिनकर ने  आकर 
हौले से उन्हें सहलाया 
पलक झपकते उड़ गया दुःख 
कोई उन्हें देख न पाया 
जीवन के ये क्षणिक दुःख 
उड़ जायेंगे यूँ हीं ----

आगे खड़ी  है मंज़िल तेरी 
हिम्मत कर लो ओ बटोही …,… 

दुःख की बदली में तुम 
इंद्रधनुष बन चमको
स्याह रातों में तुम 
जुगनू से सबक ले लो 

बन चटख धूप तुम्हें 
आस-पास बिखरना होगा 

बरखा की बूँदें बन 
दूत नव-जीवन का बनना होगा 

तुम्हीं दर्द हो दवा तुम्हीं हो 
तुम्हीं समस्या, समाधान तुम्हीं हो 

राह की बाधाओं का सामना 
करना होगा तुम्हें खुद हीं 

आगे खड़ी है मंज़िल तेरी 
हिम्मत कर लो ओ बटोही ……. 



Wednesday, 28 August 2013

कृष्ण


बाँसुरी की मधुर तान हैं कृष्ण 
कदंब के पेड़ की शीतल छांह हैं कृष्ण 

मानवता की शान हैं कृष्ण 
पवित्र प्रेम की आन हैं कृष्ण 

मित्रता की पहचान हैं कृष्ण 
असीम आनंद की खान हैं कृष्ण,…… 

                जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

Monday, 19 August 2013

लहरों ने

लहरों   ने मिलाया 

लहरों ने जुदा किया 
न तेरी कोई खता थी 
न मैंने कुछ किया। 



Wednesday, 12 June 2013

रूत मिलन की

सागर की लहरों पर किरणें 
लेती है अंगडाई 
लिए साथ में मस्त समां 
बरखा की बूँदें आई ....

प्यासी धरा की प्यास बुझी 
हर कली खिलखिलाई ...
बागों में भौरे झूम रहे हैं ...
रूत  मिलन की है आई 

Tuesday, 28 May 2013

पर ...आखिर में

कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को 
घर लौट ही आता है .....
                                                                       
लौट के जब घर आना  ही है 
तो फिर ? वो ....घर से बाहर 
जाता ही क्यों है ?

बार -बार ये सवाल मेरे....
 दिमाग से टकराता है .....




शायद उसकी आँखों में  मगरमच्छी नमी होगी  या…. फिर .....
उसके घर में जगह की कमी होगी ....इसीलिए 
 दिनभर समय बिताकर ...शाम को लौट आता है 
घरवालों की जली -कटी सुनकर रात में ....
चुपचाप सो जाता है ...

जब-तक उसकी  जान में जान होती है 
ये क्रम अनवरत चलता  रहता है 
जिस दिन से उसकी जान बेजान होती है 

वो भूलना बंद कर देता है .....

उसकी हार या फिर खुद की  जीत पर 
घर का हर कोना गुनगुनाये 
दाल नहीं गली बराबर 
लौट के बुद्धू घर को आये ......

कैसी जीत या कैसी ये हार है ?
मेरी समझ में  ये हमेशा 
घाटे का व्यापार है .....

बाहर जाने के लिए 
दिमाग से सौ तरकीब भिड़ाते हैं ..

पर ...आखिर में .. बुद्धू ही कहलाते हैं .....






Wednesday, 15 May 2013

एक दूसरे की परछाईं

ज्यों हीं शाखों   पर बंद कलियों ने 
अपनी आँखें खोली ...... 
शहद भरे मीठे शब्दों में 
कोयल कुहू -कुहू बोली ......

झूम उठी है  निशा सुहानी 
आया नया सबेरा 
चलो सखी अब आम्र कुञ्ज में 
डाले अपना डेरा .....

दो पथिक मिले 
एक राह चले 
दो सपनों ने ली थी अंगडाई ...
आज उन्हीं को साथ लिए                         

ये शाम मस्तानी आई .......

शाखें सजती जैसे गुलमोहर की 
सुर्ख फूलों की लाली से 
सज़ा रहे उन पथिकों का जीवन भी 
 एक दूसरे  की परछाईं से ......

खुशियाँ बाँटों 
खुशियाँ पाओ 
उलझन को 
मिल-जुल  सुलझाओ ......

बीत गए कुछ समय पुराने 
आनेवाले भी बीत जायेंगे 
इन राहों पर चलते-चलते 
 मंज़िल पर  छा जायेंगे .....


Monday, 13 May 2013

मेरा आईना

मुझको मेरा आईना दिखाकर 
तुमने अच्छा काम किया 
भूल गई थी जिसको मैं                                              
उसको फिर पहचान लिया .....