Tuesday, 14 February 2012

घूम आओ




जीवन की एकरसता से गर
मुक्ति पाना हो
उत्साह और उमंग को
जीवन का अंग बनाना हो
जोश किसको कहते है औ
कैसा है गंगा का बंधनयुक्त
उन्मुक्त मस्त विहार
देखना चाहते हो तो
घूम आओ हरिद्वार।

गंगा की इठलाती,लहराती औ बलखाती
जल की तरंगें हमें
जीने का राह दिखाती है
जीना किसको कहते हैं
बिना बोले सिखलाती है
दिल औ दिमाग दोनों को
ठंढक पहुँचाये ऐसी
करिश्माई है इसकी फुहार
महसुस करना चाहते हो तो,
घूम आओ हरिद्वार।



उच्श्रंखलता को दूर करने के लिये
जीवन को एक दिशा देने के लिये
थोडा बंधन जरूरी है
अपनी सीमाओं में रहने की
आदत कमजोरी नही
मजबूती की निशानी है
थोडी सी चंचलता
बहुत सारा प्यार समेटे रहती हरपल
खुद में पवित्र गंगा की धार
पाना है इसे तो।
घूम आओ हरिद्वार।


गंत्वय के प्रति ललक
मंजिल को पाने का अरमान
राह की बाधाओं को नकार
सागर से मिलने को बेकरार
हर सुख-दु;ख,मान-अपमान को
अपनाने के लिये तैयार
देखना है निर्भय विचरती गंगा का निखार तो,
घूम आओ हरिद्वार।



डगमगाते कदमों से
शाम को घर कैसे लौटता है
सुबह का भुला
देखना है तो जाओ
देख आओ लक्ष्मणझूला
श्रृंगार किसे कहते हैं और
कैसे हैं प्रकृति के विविध वेश
देखना ही है तो जाओ
घूम आओ ऋषिकेश।




36 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना,सुंदर प्रस्तुति

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  2. सुन्दर सीख़युक्त कविता.

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  3. sach prakriti se judkar kitna kuch khoobsurat anubhav man kee tamam mushkilon mein tarotaajagi de jaata hai..
    bahut sundar tasveeren aur sundar chitran...

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  4. बिलकुल...जल्द से जल्द...

    सुन्दर रचना...

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  5. ज़िंदगी की नीरसता को भंग करने का खूबसूरत नुस्खा ...

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  6. अपनी सीमाओं में रहने की
    आदत कमजोरी नही
    मजबूती की निशानी है

    bahut hi prabhavshli rachana ....badhai rana ji .

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  7. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 16-02-2012 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज...हम भी गुजरे जमाने हुये .

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  8. बहुत सुन्दर रचना,खूबसूरत प्रस्तुति

    आपका सवाई सिंह राजपुरोहित
    एक ब्लॉग सबका

    आज का आगरा

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  9. नयनाभिराम छवियों के मध्य आपकी कविता किसी तीर्थ से कम नहीं निशा जी! बहुत अच्छी महिमा बताई है आपने हरिद्वार की और सीख ज़िंदगी की!!

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  10. हरी की पोडी, लक्ष्मण झूला वाह, बात ही अलग है...
    बड़ी सुन्दर रचना...
    सादर बधाई...

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  11. डगमगाते कदमों से
    शाम को घर कैसे लौटता है
    सुबह का भुला
    देखना है तो जाओ
    देख आओ लक्ष्मणझूला
    श्रृंगार किसे कहते हैं और
    कैसे हैं प्रकृति के विविध वेश...

    बहुत ही सुन्दर कविता.. मैं ऋषिकेश हर सप्ताह जाता हूँ .. पर आपकी कविता ने एक नया रूप दिखाया है यहाँ का...

    आभार !

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  12. गंगा दर्शन और महिमा के साथ साथ सुंदर चित्रों ने मन मोह लिया

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  13. अति सुन्दर प्रस्तुति.
    गंगा,हरिद्वार,ऋषिकेश शब्द पढते या सुनते ही पावनता
    का संचार हो जाता है मन में.

    सन१९७५ से १९७७-७८ तक हरिद्वार बी.एच.ई.एल.में रहा.
    लगभग हर हफ्ते हर की पैडी,मनसा देवी मंदिर,दुर्गा देवी मंदिर
    हो आता था.महीने में एक बार ऋषिकेश भी चला जाता था.
    सर्वत्र प्राकृतिक आनंद ही आनंद का एहसास होता था.

    शानदार प्रस्तुति के लिए और मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका
    हार्दिक आभार,निशा जी.

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  15. सचमुच इस पावन देव भूमि पर जीवन की उर्जा मिलती है.सुंदर रचना.

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  16. अपनी सीमाओं में रहने की
    आदत कमजोरी नही
    मजबूती की निशानी है Bahut khoob.

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  17. हरिद्वार और लक्ष्मणझुले के सुंदर वर्णन के लिए बधाई॥

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  18. Replies
    1. घूम आओ हरिद्वार।
      कैसे हैं प्रकृति के विविध वेश
      देखना ही है तो जाओ
      घूम आओ ऋषिकेश।

      gajab likha hai aapne बहुत खूब

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  19. सुन्दर शब्दावली में
    हरिद्वार महिमा
    बेहतर ... !!

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  20. चित्र के साथ , बहुत ही सुन्दर गंगा और हरिद्वार की विशेषता -को चित्रित किया है आप ने ! अब हरिद्वार के लिए समय और यात्रा को कार्यान्वित करना पड़ेगा !बधाई

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  21. प्रस्तुति अच्छी लगी ।.मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार है । धन्यवाद ।

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  22. बहुत सुन्दर रचना, खूबसूरत प्रस्तुति. गंगा और हरिद्वार की महिमा मन को प्रसन्न करती है. बधाई इस प्रस्तुति के लिये.

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  23. वाह!!!!!बहुत खूब निशा जी,अच्छी प्रस्तुति, सुंदर हरिद्वार महिमा,...

    MY NEW POST ...सम्बोधन...

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  24. हरि का द्वार और ऋषिकेश,
    पल पल प्रकृति बदलती वेश।

    बहुत सुंदर कविता।

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  25. गंगा जी के मनोरम दृश्य को देख के जैसे जीवन सफल हो गया ... बेहतरीन रचना है ...

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  26. सत्य शोधकों और मनीषियों का अनुभव है कि प्रकृति के रास्ते इन्सान सुगमता से परमेश्वर से साक्षात्कार कर सकता है! गंगा कहीं पर भी बहे, गंगा के साथ-साथ जीवन है! क्योंकि चलने और लहलहाने के प्राकृतिक स्वभाव को अंगीकार करके मनुष्य-जीवन, सच में और पूर्णता में जिन्दा हो उठता है! अन्यथा तो हम अपने ही कन्धों पर, अपनी लाश को ही तो ढो रहे हैं! गंगा, यमुना या चम्बल किसी भी नदी के किनारे, ओर से छोर तक कहीं भी बैठ जाओ केवल जीवन ही नहीं दिखेगा, बल्कि जीवन के हजारों नये-रंग किलकारियां करते और इठलाते दिखेंगे! देहरादून के धार्मिक तटों के कोलाहल से दूर, बहुत दूर निर्जन गंगा तट का अवलोकन जो अनुभूति देगा वो ही सच्ची और निर्विकार अनुभव होगा!

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  27. उच्श्रंखलता को दूर करने के लिये
    जीवन को एक दिशा देने के लिये
    थोडा बंधन जरूरी है
    अपनी सीमाओं में रहने की
    आदत कमजोरी नही
    मजबूती की निशानी है

    ....बिलकुल सच...बहुत सुंदर रचना...

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  28. बहुत बढ़िया,बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...आज के नेता...

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