Tuesday, 7 February 2012

मेरी ख्वाहिश



मेरे दिल में तुम्हारे लिये प्यार था
तुमने उसे व्यापार समझा
मैंने तुम्हारी प्रशंसा की
तुमने उपहास समझा
सोचा था-खुशियों को साझा करने से
अपनेपन का एहसास बढ जायेगा
गम साझा करेंगे तो ये आधा हो जायेगा
पर पता नहीं कैसे ? कब ?क्यों ?
तुमने मकडी के जाले बुन डाले
मेरे स्नेह,अपनापन और आत्मीयता के
सारे अर्थ बदल डाले
दिल के दुःखमय उदगारों को
भग्न ह्रदय से कैसे मैं कहूँ?
सहा नहीं जाता जो गम
उसे कैसे मैं सहूँ।


मेरे दुःख को तुमने नही
मैने ही बडा कर दिया
अपनेपन की चाहत ने
आज मुझे इस मोड पर
 खडा कर दिया
 जहाँ एक तरफ तुम हो
दूसरी तरफ है
अनजानी सी डगर
सधे कदमों से मैं उस
पथ पर कदम बढा रही हूँ मगर
मुझे पता है जिस दिन
तुन नैराश्य औ असुरक्षा के
 घेरे  से बाहर आओगे
अपने साथ मुझे खडा न पाओगे
उसी क्षण से मुझे पाने के लिये
बेताव हो जाओगे।

तुम्हारे पास होगा मेरे लिये केवल
अपनापन औ प्यार पर
तब तक इतनी देर हो चुकी होगी
कि टुट जायेगी मेरी उम्मीद की डोर
और मैं चली जाऊँगी उस ओर
जहाँ से मेरा लौटना नामुमकिन होगा
और तुम्हारा मेरे पास आना होगा असंभव।

हो सके तो उस दिन
अपने द्वारा बुने मकडी के जाले
को साफ कर देना
दिल की गहराईयों से मुझे
माफ कर देना
जाते-जाते एक बात बताते जाऊँ
ख्वाहिश है मेरी
कभी किसी मोड पर गर
मैं तुमसे टकराऊँ
तो तुम्हे हँसते खिलखिलाते ही पाऊँ।

तुमने मेरे लिये क्या सोचा
ये गम नही है
गम सिर्फ इस बात का है
कि मेरे कारण तुमने अव्यक्त
दु;ख सहे
समझ गई मैं सारी बातें
बिना तुम्हारे कहे
वादा करती हूँ तुमसे
अब वो बात नही दुहराऊँगी
खुश रहो तुम हमेशा
इसीलिये तुम्हारी दुनिया से
दूर चली जाऊँगी ।

तुम्हारे साथ बिताया हर पल
मेरे लिये बहुत अच्छा था
पर विश्वास करो
बनावटी नही था कही भी
हरेक व्यवहार मेरा सच्चा था ।

ज़िदगी के झंझावातों से
अपनों के दिये आघातों से
होंठों की हँसी और चंचलता
कुछ देर के लिये खो सकती है पर
किसी की मूलप्रकृति नही सो सकती
अपना स्वभाव बदलकर मैं जी नही सकती
चुपचाप रहकर गम के आँसू पी नही सकती ।

कभी अच्छा कभी बुरा
ये समय का फेरा है
जैसी जिसकी सोच होती
वैसा उसका घेरा है ।

सब को वही-वही करना है
जो प्रकृति करवाती आई है
सुख-दःख,सही-गलत
सभी कर्मों का करती वो भरपाई है
आज रात है अगर तो
कल सबेरा भी होगा
डगर भले अंजान हो पर
कोई न कोई सहारा होगा
समझौता नही कर सकती मैं
मेरा चरित्र मेरे साँसों की कुंजी है
मोल नही है जिसका
वो अनमोल पुंजी है ।

गर मिल जाओ उस राह पे कभी तो
मुझे देखकर आह न भरना
अपनापन औ स्नेह देने की
मुझको कोई चाह न करना
जानती हूँ तुम्हे ज़िद मुझे
मनाने की होगी
पर समय फिर कुचक्र रचेगा
और मुझे जाने की जल्दी होगी ।
पुरानी रचना एक बार फिर से ..........

22 comments:

  1. सब को वही-वही करना है
    जो प्रकृति करवाती आई है
    सुख-दःख,सही-गलत
    सभी कर्मों का करती वो भरपाई है
    आज रात है अगर तो
    कल सबेरा भी होगा
    डगर भले अंजान हो पर
    कोई न कोई सहारा होगा Nisha ji sachhe mayane me bhagyvad ko prerit karati rachana hai ....sath ....prkriti pr gahara vishwas aur asha ko sametati hui poorn rachana hai ...bahut hi sarthak aur behad dilchasp ...badhai sweekaren.

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  2. पूरा जीवन एक कविता में उकेर कर रख दिया आपने...
    बहुत खूब निशा जी..
    सस्नेह.

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  3. Bhawo ko sundarta se ukera hai...mere blog pr aapka swagat hai...

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  4. bhawo ko sundar shbdon se sajaya hai..

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  5. बहुत खूबसूरती से ....बड़ी शालीनता से अपनी बात कही ...!!!
    बहुत सुंदर रचना ...

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  6. मन के भावो को शब्द दे दिए आपने......

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  7. आज रात है अगर तो
    कल सबेरा भी होगा
    सुंदर रचना.....

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  8. बहुत अच्छा लिखा आपने,भावों की बढ़िया खुबशुरत प्रस्तुति....

    NEW POST.... ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...

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  9. सभी को धन्यवाद।

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  10. किसी की मूलप्रकृति नही सो सकती
    अपना स्वभाव बदलकर मैं जी नही सकती
    चुपचाप रहकर गम के आँसू पी नही सकती ।

    अंतर्मन के ऐसे अहसास ही सहारा बनते हैं.... सुंदर लिखा है ...

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

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  12. हो सके तो उस दिन
    अपने द्वारा बुने मकडी के जाले
    को साफ कर देना
    दिल की गहराईयों से मुझे
    माफ कर देना
    जाते-जाते एक बात बताते जाऊँ
    ख्वाहिश है मेरी
    कभी किसी मोड पर गर
    मैं तुमसे टकराऊँ
    तो तुम्हे हँसते खिलखिलाते ही पाऊँ।

    यही निःस्वार्थ प्रेम है जो सिर्फ देना जनता है पाना नहीं !
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति..!
    आभार !

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  13. ज़िदगी के झंझावातों से
    अपनों के दिये आघातों से
    होंठों की हँसी और चंचलता
    कुछ देर के लिये खो सकती है पर
    किसी की मूलप्रकृति नही सो सकती
    अपना स्वभाव बदलकर मैं जी नही सकती
    चुपचाप रहकर गम के आँसू पी नही सकती ।
    दार्शनिक और व्यावहारिक दोनों पक्षों को उभारती रचना .खूब सूरत एहसास जगाती अपनी सी लगे है ये रचना .

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  14. समय दर्द भी दवा भी... समय बड़ा बलवान॥

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  15. तुमने मेरे लिये क्या सोचा
    ये गम नही है
    गम सिर्फ इस बात का है
    कि मेरे कारण तुमने अव्यक्त
    दु;ख सहे
    समझ गई मैं सारी बातें
    बिना तुम्हारे कहे
    वादा करती हूँ तुमसे
    अब वो बात नही दुहराऊँगी
    खुश रहो तुम हमेशा
    इसीलिये तुम्हारी दुनिया से
    दूर चली जाऊँगी ...

    ऐसी सोच बस नारी के ही जीवन के लिए क्यों निश्चित है ... क्यों बलिदान सिर्फ नारी के लिए है ... सोचने को विवश करती है आपकी रचना ....

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    Replies
    1. दिगम्बर जी वस्तुतः किसी नारी के किसी व्यवहार से प्रेरित होकर हीं मैने ये कविता लिखी है।

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  16. किसी की मूलप्रकृति नही सो सकती
    अपना स्वभाव बदलकर मैं जी नही सकती
    चुपचाप रहकर गम के आँसू पी नही सकती ।
    Dik ko chune wali prastuti hai.

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  17. मेरी ख्वाहिश




    मेरे दिल में तुम्हारे लिये प्यार था
    तुमने उसे व्यापार समझा
    मैंने तुम्हारी प्रशंसा की
    तुमने उपहास समझा
    सोचा था-खुशियों को साझा करने से
    अपनेपन का एहसास बढ जायेगा
    गम साझा करेंगे तो ये आधा हो जायेगा
    पर पता नहीं कैसे ? कब ?क्यों ?
    तुमने मकडी के जाले बुन डाले
    मेरे स्नेह,अपनापन और आत्मीयता के
    सारे अर्थ बदल डाले
    दिल के दुःखमय उदगारों को
    भग्न ह्रदय से कैसे मैं कहूँ?
    सहा नहीं जाता जो गम
    उसे कैसे मैं सहूँ।


    मेरे दुःख को तुमने नही
    मैने ही बडा कर दिया
    अपनेपन की चाहत ने
    आज मुझे इस मोड पर
    खडा कर दिया
    जहाँ एक तरफ तुम हो
    दूसरी तरफ है
    अनजानी सी डगर
    सधे कदमों से मैं उस
    पथ पर कदम बढा रही हूँ मगर
    मुझे पता है जिस दिन
    तुन नैराश्य औ असुरक्षा के
    घेरे से बाहर आओगे
    अपने साथ मुझे खडा न पाओगे
    उसी क्षण से मुझे पाने के लिये
    बेताव हो जाओगे।

    तुम्हारे पास होगा मेरे लिये केवल
    अपनापन औ प्यार पर
    तब तक इतनी देर हो चुकी होगी
    कि टुट जायेगी मेरी उम्मीद की डोर
    और मैं चली जाऊँगी उस ओर
    जहाँ से मेरा लौटना नामुमकिन होगा
    और तुम्हारा मेरे पास आना होगा असंभव।

    हो सके तो उस दिन
    अपने द्वारा बुने मकडी के जाले
    को साफ कर देना
    दिल की गहराईयों से मुझे
    माफ कर देना
    जाते-जाते एक बात बताते जाऊँ
    ख्वाहिश है मेरी
    कभी किसी मोड पर गर
    मैं तुमसे टकराऊँ
    तो तुम्हे हँसते खिलखिलाते ही पाऊँ।

    man ki gahraion se likhi gayi rachna hai, sadgi se me man ki baten likhi hai bahut achha laga pahli bar aapki rachna ko pada achha laga
    :- Hari Attal BHILAI ( C G)

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  18. यह दुखद है कि यह अनुभूति आज हर दूसरी नारी की है.. बेहतरीन अभिव्यक्ति

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