Tuesday, 24 January 2012

सागर का दर्द


बरसों से मिलने की आस लिये बैठा हूँ
इंतजार की आग में पल-पल जला करता हूँ
ख्वाबों से तेरे,दिल को बहलाये रहता हूँ
सागर हू फिर भी, मैं प्यास लिये बैठा हूँ ।


इठलाती नदियाँ औ बलखाती तालें हैं
सतरंगी सपनों का संसार लिये फिरता हूँ
तेरे दरश को पलक बिछाये रहता हूँ
सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ।


विरह में  मैं पागल, दिवाना मैं घायल
सीने में अपने हलचल दबाये रखता हूँ
मौन की अनुगूँज में खुद को डूबाये रखता हूँ
सागर हूँ फिर भी, मैं प्यास लिये फिरता हूँ।


खुद का सुधबुध औ चैन गँवाये बैठा हूँ
लहरों की तरंगों में गम को छिपाये बैठा हूँ
नैंनों से अपने मैं,नींद भगाये रहता हूँ
सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ

34 comments:

  1. बरसों से मिलने की आस लिये बैठा हूँ
    इंतजार की आग में पल-पल जला करता हूँ
    ख्वाबों से तेरे,दिल को बहलाये रहता हूँ
    सागर हू फिर भी, मैं प्यास लिये बैठा हूँ ।
    ....... बहुत ही गहरे भाव ... सागर की तरह

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  2. कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

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  3. सागर हूँ..फिर भी प्यासा हूँ..
    बहुत सुन्दर रचना..

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  4. खुद का सुधबुध औ चैन गँवाये बैठा हूँ
    लहरों की तरंगों में गम को छिपाये बैठा हूँ
    beautiful creation with deep thought.

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  5. सागर की प्यास है कि बुझती ही नहीं .. नदियाँ उसमें मिल कर सागर ही बन जाती हैं ..सुन्दर प्रस्तुति

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति,भावपूर्ण अच्छी रचना,..प्यारी पंक्तियाँ
    WELCOME TO NEW POST --26 जनवरी आया है....
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

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  7. खुद का सुधबुध औ चैन गँवाये बैठा हूँ
    लहरों की तरंगों में गम को छिपाये बैठा हूँ
    नैंनों से अपने मैं,नींद भगाये रहता हूँ
    सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ

    गहन ....सुंदर पंक्तियाँ

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    गणतन्त्रदिवस की पूर्ववेला पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  9. सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ....

    सागर से गहरे भाव... बहुत सुन्दर...

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  10. विरह में मैं पागल, दिवाना मैं घायल
    सीने में अपने हलचल दबाये रखता हूँ
    मौन की अनुगूँज में खुद को डूबाये रखता हूँ
    सागर हूँ फिर भी, मैं प्यास लिये फिरता हूँ...

    विरह की वेदना में घायल लोगों की प्यास कभी नहीं बुझती ... बहुत खूब ..

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  11. सागर की वेदना को सुन्दर शब्द दिए हैं आपने.सुन्दर प्रस्तुति.

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  12. बहोत सुंदर प्रस्तुती ।

    आपका हमारे ब्लॉग पर स्वागत है ।

    हिंदी दुनिया

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  13. बरसों से मिलने की आस लिये बैठा हूँ
    इंतजार की आग में पल-पल जला करता हूँ
    ख्वाबों से तेरे,दिल को बहलाये रहता हूँ
    सागर हू फिर भी, मैं प्यास लिये बैठा हूँ ।.......सागर के दर्द को बखूबी शब्दों में उतारा है आपने.........

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  14. इसकी .उसकी सबकी कशिश लिए यह रचना

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  15. बहूत सुंदर
    बेहतरीन अभिव्यक्ती ..

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  16. सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ।

    सागर से गहरे भाव......वाह !!!!

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  17. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
    ----------------------------
    कल 27/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  18. खुद का सुधबुध औ चैन गँवाये बैठा हूँ
    लहरों की तरंगों में गम को छिपाये बैठा हूँ
    नैंनों से अपने मैं,नींद भगाये रहता हूँ
    सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ

    वाह .......लाजवाब प्रस्तुति



    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

    vikram7: कैसा,यह गणतंत्र हमारा.........

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  19. सुंदर रचना!गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें .....

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  20. बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति|
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें|

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  21. ख्वाबों से तेरे,दिल को बहलाये रहता हूँ
    सागर हू फिर भी, मैं प्यास लिये बैठा हूँ ।
    सागर की वेदना को सुन्दर शब्द दिए हैं आपने
    निशा जी इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकारें...

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    1. शनिवार के चर्चा मंच पर
      आपकी रचना का संकेत है |

      आइये जरा ढूंढ़ निकालिए तो
      यह संकेत ||

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  22. beautiful creation with deep thought.

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  23. कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !

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  24. "मौन की अनुगूँज में खुद को डूबाये रखता हूँ
    सागर हूँ फिर भी, मैं प्यास लिये फिरता हूँ।"

    वाह ! बहुत सुंदर निशा जी

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  25. इठलाती नदियाँ औ बलखाती तालें हैं
    सतरंगी सपनों का संसार लिये फिरता हूँ
    तेरे दरश को पलक बिछाये रहता हूँ
    सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ।

    बहुत खूब।
    अति सुंदर रचना।

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  26. बताइए,अब अगर सागर ही प्यासा हो,तो नदियां और ताल क्या करें!

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  27. इठलाती नदियाँ औ बलखाती तालें हैं
    सतरंगी सपनों का संसार लिये फिरता हूँ
    तेरे दरश को पलक बिछाये रहता हूँ
    सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ।

    बहुत सुंदर रचना बेहद खूबसूरत भाव लिये.

    बधाई.

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