Monday, 25 June 2012

क्षणिकाएँ

ब्लोगर साथियों थोडा ब्रेक लेती हूँ .....यात्रा की बातें अगली कड़ी में आज .........कुछ क्षणिकाएँ .....

जग से लड़ना
छोड़ दिया
खुद से लडूंगी ....


मत तोड़ो
दुःख होगा
सच कहती हूँ ......


छोटी सी ये जिन्दगी
छल से तुम्हारी
लंबी हो गई .....


खुशियाँ देनी चाही मैंने
तुमने पर्वत सा
गम दे दिया ....



मन के मीत
मेरे जीवन संगीत
भूल मत जाना .....



ये रात ,ये दिन
कटते नही
तुम बिन ....


तुम आये
बहार आई
दिल ने गाया 
आँखें मुस्कुराई .....


मै तो नहीं भूली
तुम भूल जाओ
दू:खी हुई मै
तुम मुस्कुराओ .....

Sunday, 17 June 2012

यमुनोत्री की यादें


ब्लागर सथियों आज अपनी यात्रा का संचिप्त विवरण प्रतुत कर रही हूँ ......
हम चार परिवार थे जिन्होंने एक साथ इस यात्रा का प्लान बनाया था ...जिनमे आठ बड़े और पाँच बड़े  बच्चे थे .हरिद्वार में ही टूरिस्ट एजेन्सी से बात करके टेम्पों ट्रेवेलर जो की 14 सीटर थी उसे बुक कराया .वैसे खतरनाक
रास्तों को देखकर मुझे महसूस हुआ की बस में जाने के बजाय इस प्रकार की गाडी ही ठीक है ..हम सुबह नौ बजे  हरिद्वार से चले थे  एजेंसी के प्लान के अनुसार हमे शाम तक जानकी चट्टी पहुचना था पर नही पहुच पाए ...इसका कारण शायद ये भी हो सकता है की गाड़ी हरिद्वार से देर से चली और गाड़ी तथा ड्राईवर दोनों पंजाब के थे .ड्राईवर को रस्ते की जानकारी नही थी .....सच ये जानकर मुझे और भी डर लगने लगा था ...मैंने खुद को जीभर कोसा की ये जानकारी मैंने पहले क्यों नही ली ...खैर अब तो कुछ नही किया जा सकता था ...
मैंने ड्राईवर से कहा ..भैया गाड़ी धीरे चलाओ ....उसने भी सहमती वयक्त करते हुए गाडी धीरे चलाई ..अंजान होने की वजह से रास्ते की जानकारी भी लेनी पड़ती थी ....शाम करीब सात बजे हम सयाना चट्टी के पहले पालिगाड  नामक स्थान में रुके .यात्रा को सुखमय बनाने के लिए ये जरूरी है की सुबह जितना जल्द हो रवाना हो जाईये और शाम को विश्राम कीजिये इससे होटल भी अच्छा और उचित रेट पर मिल जाता है ..
रात  हो जाये तो मज़बूरी में रहना पड़ेगा ....आइये चित्रों के माध्यम से   आप भी एक झलक लें ....


....



यमुनोत्री  देहरादून और मसूरी होकर गए थे ....मसूरी की एक झलक .....

साथ में पतिदेव और उनकी बहन ......





पालिगाड का वो होटल जिसने हमें बसेरा  प्रदान किया ...
हम प्रथम ग्राहक थे उसके ....अपनी रोटी  खुद बनाई थी ...

असल में जानकी चट्टी के चक्कर में देर हो गई फिर अंधेरा छाने लगा था ..अत:रुकना पड़ा ...
























वाह मनभावन दृश्य ......थकान और रास्ते का भय काफूर ......












जानकी चट्टी से चढ़ाई शुरू कर दी समय 8.30(सुबह )




थोडा आराम .......





वो राही तुम रूको नहीं ....




वीर तुम बढे चलो ......






चाय  पी  लेते हैं ......





















यमुनाजी के दर्शन  कर लें ......









5 किलोमीटर की दूरी हमने 4.5 घंटे में पूरी की।.






अकेले उतरने का भी अलग मजा है ...कोई तनाव नही ...प्राकृतिक दृश्यों को देखते हुए  बहुत अच्छा लगता है. ..
सच में जीवन में जब आप उँचाई पर चढ़ते हैं ...तब साथ की जरुरत होती है क्योकि उस समय 
हम दबाव और तनाव में जीते हैं पर नीचे उतरते हुए हम बेफिक्र होते हैं ...दौलत और शोहरत 
हमें कमजोर बनाती है ...मजबूत नही ....अत: इन्सान को उसे अपनी दासी बनानी चाहिए उसका  दास 
नही बनना चाहिए .......ये मेरे  विचार हैं आपकी आप जानो.......








आख़िरकार जंग जीत ली .....विश्वास नही होता ......
नीचे उतर गए हम .......

यात्रा को आसान  बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें ....
सभी के पास पैसे होने चाहिए ...
समूह में लोग बिछड़  जातें हैं ...बच्चों के साथ कोई न कोई अवश्य रहें ...
जो चल नही पातें वे पालकी में जाएँ ....
खच्चर हरगिज न करें ....
चढ़ते या उतरते समय कोशिश करें की पहाड़ी के तरफ रहें ...
 एक शाल या स्वेटर अवश्य रखें ....
बाकि भगवान् पर छोड़ दें .....


चलिए फिर मिलेंगे ...........

Sunday, 10 June 2012

चारधाम (उतराखंड )की यात्रा ......संस्मरण

ब्लागर साथियों आपलोगों को बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है की मेरी अविस्श्नीय,अकल्पनीय ,अविस्मरनीय ......पहाड़ी ....दुर्गम रास्तों से गुजरकर जानेवाली यात्रा
पूरी हो गई .मैंने हमेशा यही सोचा था की मै केदारनाथ तो कभी जा ही नही सकती पर
मै वहाँ से वापस भी आ गई ....सच में बड़ा खतरनाक रास्ता है पर बहुत मजा आया सिर्फ एक दिन
डर लगा खतरनाक मोड़ों से फिर यात्रा रोमांचक लगने लगी थी ......आइये उन यादों को आपके साथ
बाँटती हूँ ..... 





शुरुआत  गंगा स्नान से

पति संजय महाराणा और बेटा संकेत के साथ  माँ गंगा की शरण में









हर की पौड़ी पर नहाने के बाद कपडे बदलने के लिए जगह की व्यवस्था भी है .
देखना  मना है ..........










तैयार हो गये हम .










चंडी देवी और
मनसा देवी दर्शन के लिए रोपवे पर अम्ब्रिश अधिकारी जी और उनकी पत्नी
शशि ...हमारी यात्रा के सूत्रधार ......








पहली बार रोपवे में बैठने की कोशिश कर रही हूँ डर  के मारे  उपर देख रही हूँ साथ में बेटा संकेत .








दर्शन हो गया .






















चलो अब सपनों का महल भी बना लें .







चारधाम
के लिए प्रस्थान









भीड़ में अकेला यही है दुनिया का मेला ....



चलिए फिर मिलते हैं ........

Monday, 21 May 2012

अगला मोड़

तुम्हें सूरज  की किरणें चाहिए 
मुझे चंदा की चांदनी ..........
तुम टकसाल  के प्रहरी हो ??????
मैं वीणा की रागिनी
 मानव-मन की विषमताओं को
जान सका न कोय ??????
राहें जुदा-जुदा है अपनी
कैसे मिलना होय???????
मिलना ही है गर तुमको तो?????
भगीरथ सा प्रयास करना होगा
राह बदलकर राही तुमको
अगले मोड पर -----
मिलना होगा
मेरा क्या है़------
बनकर बदली कहीं भी
बरस जाऊगी----
राह तुम तकते रहोगे-----
नज़र नहीं कहीं आउँगी
बनकर यादें मानसपटल पर
जीवनभर तडपाऊँगी------- 



ब्लागर साथियों आवश्यक कार्य की वजह से १५ दिन तक ब्लाँग जगत से दूर रहूँगी----------

Monday, 14 May 2012

जीवनसाथी मेरे

आज के दिन ही (15.05.1990)
दो अनजान पथिकों ने
जीवनभर साथ निभाने की कसम खाई थी------
जीवन और जीवन के संघर्ष
इतने कठिन होते हैं
ये बात उस समय भला कहाँ----
समझ में आई थी ???????


पर----------
हमसफर साथ हो तो ----
सफर हँसते- हँसते कट जाता है
खुशियों की छाँह तले
गम धीरे से खिसक जाता है।

जीवनसाथी मेरे ----
जानती हूँ
मैं बाग तुम बागवाँ हो
मेरे जमीं और आसमाँ हो
मेरे चाँद और सितारे हो
पतझड नही आये जिसमें
मेरे जीवन की वे बहारें हो

चाहत है मेरी---
दामपत्य जीवन के सफर में
अधिकार और कर्तव्य की भावना के
साथ-साथ मैत्रीभाव भी बहे
जो भी कहना हो मुझको
मेरा दिल निःसंकोच कहे -----


तमन्ना है मेरी----
भले हीं मेरे पथ में
फूल नहीं बिछाना
पर ----
काँटा बनकर कभी
मेरे दिल को नही दुखाना----

भावना के वशीभूत होकर
अंधविश्वास मत करना
परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हो
मुझपर अविश्वास नहीं करना ।

जरूरत पडी कभी अगर तो ????
भले हीं सहारा मत देना
पर साजिश करके औरों से
बेसहारा भी न करना ।

दुःखी देख मुझे कभी
दुःखी नहीं तुम होना
दुःख से चाहे घिरे रहो
हरदम हँसते रहना
हँसता देख तुम्हें मेरे साथी
खुशी-खुशी जी लूगी
संग तुम्हारे रहकर सारे
गम को मैं हर लूँगी।

इन बातों का रखना ध्यान
सफर खुशियों से कट जायेगा

हरसिंगार के फूलों से मेरे ----
जीवन का पथ भर जायेगा।

Thursday, 10 May 2012

सुखमय यादें





एक-एक कर दिल के सारे
गिरह खोल दो----
जितनी भी बातें हैं मन में
बेहिचक  बोल दो----
क्या पता कब ??????
जिन्दगी की शाम आ जाये ????
कौन सी मुलाकात ??????
अंतिम  पैगाम  बन जाये---
 न जाने ----- कब ????कहाँ????कैसे ????
जिन्दगी और मौत की ठन जाये????


 मेरे घर का पिछवाडा--------

  बचपन से मेरे सुख-दुख का सहभागी----
                                         मेरी पहली पाठशाला------
                                            वक्त ने जिसे बदल दिया -----
  
     

मेरे घर का आंगन जहां चांद तारों को देखते हुये मैं सपने संजोती थी।




लाडों में पली

नाज़ों से पली
प्यारी बिटिया
ससुराल चली------











पल भर की खुशी
दुखविनाशक हथियार----

मां की कमी पर ----
भाभी का साथ----





बहना यूं ही बहती रहना ------








मौसी का घर
खुशियों का जहां---------











भाई-भाभी और मौसी के साथ----खुशियों की बरसात ----



]

ढेर सारी खुशियों को मेरी झोली मे देनेवाले मेरे पतिदेव
अपने ससुरालवालों के साथ-----













बाबुजी की कमी पर -------

खुशी की कोंपलें भतीजा -----भतीजी----










नानी का गाँव-----
सपनों का जहाँ ----
  



अलविदा बचपन की यादें
अलविदा सुखमय छाँह----
याद नहीं आना अब मुझको----
ये है मेरा अंतिम सलाम----