Monday, 13 July 2015

हो सके तो

ज़िंदगी को हक़ीक़त से 
नज़रों को नज़ारों से
 किसी की यादों को खुद से 
              अलग कर सको तो ----कर लेना 
लालच की बंज़र जमीं पे 
कुत्सित इरादों की आड़ में 
बीज खुशियों के    
                                   बो सको  तो----- बो लेना 
झूठ के दलदल पर खड़ी 
अहंकार की दीवार   को 
सच्चाई के साबुन से 
                                   धो सको  तो  ---- धो लेना 
निश्छल निर्मल हँसी के लिए 
झूठे दम्भ को दरकिनार कर 
खुद की गलतियों पर पश्चाताप कर 
                                 हो सके तो ----रो लेना  

20 comments:

  1. आपने तो दृक दृश्य विवेक चूड़ामणि ही पेश कर दी

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, फ़िल्मी गीत और बीमारियां - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. वाह! बहुत ही सुन्दर रचना ..

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 16 - 07 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2038 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  6. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ
    बो सको तो----- बो लेना
    झूठ के दलदल पर खड़ी
    अहंकार की दीवार को
    सच्चाई के साबुन से
    धो सको तो ---- धो लेना

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  7. बहुत खूबसूरत !!

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  8. नए अंदाज में ---
    बहुत सुंदर तरीके से कही गई..

    भावनाओं की कविता...

    प्रशंसनीय.

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  9. सभी को तहेदिल से धन्यवाद ....

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  10. बहुत सटीक चेतावनी परक आवाहन ,

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