Monday, 15 June 2015

मौन


आसमान में छिडी लडाई
चंदा और तारों में
तारे बोले-सुन चंदा तुम
व्यर्थ क्यों इतराते हो ?
रोज-रोज तुम रुप बदलते
कुछ दिन तुम छिप जाते हो
छिपना मेरी हार नही है
छिपना मेरी जीत है
सब दिन होत न एक समान
ये जीवन की रीत है
 गर तुम पालन करते इसका
कभी नही झल्लाते
व्यर्थ नही अभिमानी बनते
यूँ ही टूट न जाते
क्रोध वैर से नाता जोडूँ
मुझको नही मंजूर है
शीतलता प्रदान करुँ
खुशी मुझमें भरपूर है
चंदा की चांदनी को
ताना मारे कौन
जबाव नही सूझा तारों को
साध लिया सबने ही मौन।
  मेरी बहुत पुरानी रचना,,,,, नई दुनिया में प्रकाशित हुई थी।  शायद आपको भी अच्छी लगे। 

4 comments:

  1. बहुत सुंदर तरीके से उतरा ना ...अब कुछ बाकी न बचे कहने के लिए ...अंतिम पंक्तियाँ सब कुछ कह जाती है ...आपका आभार

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  2. बहुत अच्छी रचना है ..

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  3. कितनी अच्छी बात कही चंदा ने यदि ये बात हम भी अपने जीवन में धारण कर लें तो कितना अच्छा हो :)

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