Monday, 18 July 2011

माफ करना

भूल जाऊँ तुमको मैं पर
दिल मेरा तेयार नही है
भ्रम नही सच्चाई है
तुमको मुझसे प्यार नही है।

बेचैन हो जाती रह-रह कर
यादों कि अलख किसने बिखराई है ?
दुःख सिर्फ इस बात की है
तुमने धोखे से मेरे दिल में जगह बनाई है।

जिंदगी की आपाधापी में
अपनों का साया छूट गया
औरों की क्या बात
जब मेरा दिल ही मुझसे रुठ गया।

पैरों के नीचे से जमीन खिसकी है
सिर से आसमान
सूना-सूना मन प्रांगन है
सूना सारा जहाँ ।

माँ जमीन होती है गर तो
पिता आसमान
ढूँढू कहाँ कैसे मैं उनको ?
कहाँ है मेरा वो घर-द्वार ?
दो अँखियाँ किया करती थीं
बेसब्री से मेरा इंतज़ार ।

सीमेंट कंक्रीट से बने
 मकान को घर नही कहते हैं
घर उसे कहते हैं जहाँ
माँ-बाप औ बच्चे
घुल-मिल कर रहते हैं।

घर में रहता प्यार हमेशा
नही बैर न पैसा
जहाँ खुशी का मतलब होता
केवल पैसा-पैसा
घर नही वो है एक सराय के जैसा

वैसे सराय में आने की
कीमत वसूली जायेगी
जिससे मेरे आत्मसम्मान औ स्वाभिमान की
नींव दरक जायेगी
होंठों से हँसी , आँखों से नींद
चली जायेगी
माफ करना सरायवालों
तेरे दर पे मैं तो क्या
मेरी परछाई भी नही आयेगी ।

2 comments:

  1. bahut sahi likha hai.....aur isme pehli 4 lines mjhe bht pasand hai.....oem me sarcasm aur emotions ka bht acha blend h.

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