Wednesday, 18 May 2011

मैंने देखा है

मैंने देखा है
हँसतों को रोते हुए
मैंने देखा है
जिन्दों को मरते हुए
बहुत दुखदाई है
पल-पल का मरना
पर इस बात से भला क्या डरना!

अकेले आये हैं
अकेले है जाना
साथ तो किसी का है
केवल बहाना
नदी अकेली चलती है
पता नही गंतव्य कहाँ है ?
पथ में काँटे लाख बिछे हो
ओ राही तुम गम मत करना
पडे वक्त अगर कभी तो ?


हिम्मत से समझौता करना
मैंने देखा है
तारों को टूटते हुये
मैंने देखा है
तरुवर को सूखते हुये
चाहे कितने तारे टूटे
व्योम नही घबराता
खडा तना वह
मही के ऊपर
मन ही मन मुस्काता
पतझड के जाते ही
जब आयंगे मौसम
बहार के
नव पल्लव प्रसून खिलेंगे
हरियाली भी होगी
कृत संकल्प हो
बढो बटोही
तेरी ही जय होगी।

4 comments:

  1. कल 26/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. वाह ...बहुत ही अच्‍छी रचना ।

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