Tuesday, 20 May 2014

ऐ दिल.… तूँ चल

ईंट पत्थर जोड़ रहे हैं 
धड़कते दिलों को तोड़ रहे हैं 
सुन पा रहे नहीं 
अपनों की चित्कार 
ऐसे अपनों को
 अपना समझने की 
हसरत है बेकार ---

झूठा साक्षी बना है सत्य का 

निशा उम्मीद की रश्मियाँ बो रही है 
रावण -कंसों की दुनियाँ में 
मानवीय संवेदनाएं खो रही है ----

महसुस नहीं हो पा रहे जहाँ 

माँ-जाई को माँ-जाई के 
कातरता भरे सिसकते अरमान 
ऐसी निर्ममता तो है केवल 
एक कसाई की पहचान ----

ऐसे कसाई के लिए रोना क्यों ?
उम्मीद की किरणें बोना क्यों ?

ऐ दिल.… तूँ चल 

तूँ अकेला हीं चल 
भीड़ में खोने से अच्छा है 
निर्जन में खोना
 बेफिक्री की दुनियाँ में 
चैन से सोना---- 

Sunday, 6 April 2014

…तो…....






बादल बरसे ना 
धरती  तरसे ना 
बिजली चमके ना..... तो…… 
                                कोई मतलब नहीं। 
मन बहके ना 
दिल हर्षे ना 
आँखें छलके ना …तो….... 
                              कोई मतलब नहीं। 

उपवन महके ना 
कोयल कुहूके ना 
चिड़ियाँ चहके ना.…तो….... 
                              कोई मतलब नहीं। 
सब्जी में नमक ज्यादा हो 
रिश्तों में मर्यादा ना हो 
शतरंज में प्यादा ना हो.…तो…… 
                                  कोई मतलब नहीं। 

Thursday, 20 March 2014

माँ----बनकर देखो -

हर साँस से  सपने 
उर से स्नेह ---
 प्रकृति के कण -कण से 
सुखों की  बरसात हो रही थी 
उपलब्धि बड़ी नहीं--छोटी सी (?) थी ---
एक माँ अपने बच्चे को ढूध पिला रही थी-- 

नकली आवरण 
नकली शानों-शौकत 
नकली खुशियों को फेंको 
दुनियाँ तेरी बदल जायेगी 
माँ----बनकर देखो ----



Friday, 21 February 2014

बोलो बसंत

उजड़े को सँवारते हो 
नाउम्मीदी से भरे दिलों में 
उम्मीद की  किरण जगाते हो.… इसीलिए,,,
बसंत---   तुम..... ऋतुराज कहलाते हो..... 

यहाँ-वहाँ  सारे जहाँ में 
छोटे-बड़े का भेद किये बिना 
गुलशन को महकाते हो..... इसीलिए ,,,,
बसंत ---तुम.… ऋतुराज कहलाते हो.… 

माँ शारदे का प्रसाद 
होली का अल्हड आह्लाद 
झोली में लेकर आते हो..... इसीलिये,,,,
बसंत ---तुम.…ऋतुराज कहलाते हो.…

गाँव शहर हर गली की  बिटिया 
निर्भय जीवन जी पाये 
कोई भी दुष्कर्मी उसके 
अस्मत / भावनाओं से खेल न पाये 
फिज़ा में ये रंग कब-तक बिखराओगे 
उसी बसंत का इन्तजार है 
बोलो   बसंत ! कब आओगे ?

Tuesday, 21 January 2014

ख़ामोशी




आलम था ख़ामोशी का 
दिल दहल गया.……                    इतनी मिली खामोशियाँ कि 
मन बहल गया..... 

ख़ामोशी की ख़ामोशी से 

बात हुई --- बड़ी लम्बी सी.--- 
छोटी मुलाकात हुई ----   


                                                               


















निशा की  निस्तब्धता 
नभ की ख़ामोशी 
चाँद तारों की बस्ती में 
  ग़ज़ब की खुमारी है. 



सर्द मौसम की  आहट 
ख़ामोशी की  सुगबुगाहट 
ताकत को तौलती है 
दिल भारी और लब बंद है 
सिर्फ आँखें हीं बोलती है.


Tuesday, 31 December 2013

नए वर्ष की नई ख़ुशी में तहेदिल से बधाई है---

बीत चला २०१३ ..... अब ----
१४  आने वाला है 
दुःख -दर्द की  बातें  भूल 
दिल अब गाने वाला है 
नयी उम्मीद , नया  सपना  
नयनों  में सजने  वाला है ---

पेट भरा पर  होंठ अतृप्त  है 
हाथों में जिसके प्याला है 
कौन सुने किस- किसकी बातें ?
हर शख्स सुनाने वाला है----


छोडो उन बातों को जिनसे 
दिल  उचटने  वाला है 
जिसे पता है भूख की कीमत 
देता वही निवाला है ---


पुराने को विदा करें 
नव-स्वागत की घड़ी आई है 
मंजिल खुद उसे ढूँढ  लेती 
जिसने भूले-भटके को राह दिखाई है ---



यही संदेशा लिए  निशा (२०१३ की-)
दर पे सबके  आई है 
नए वर्ष  की नई ख़ुशी में 
 तहेदिल से बधाई है---
                       
      आप को नए वर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनायें ----  नया वर्ष आप के लिए नए सपने , नए अपने और नयी उम्मीदें लेकर आये। पुराने को हँसकर विदा करें और नए का दिल से स्वागत करें …  इससे जीवन का सफ़र सुहावना होगा ---- धन्यवाद। 





Saturday, 23 November 2013

एक दिन इत्तेफाक से

एक दिन इत्तेफाक से
मेरे साथ एक अजीब सी बात हो गई 
कहीं जा रही थी कि ---अचानक----
 मेरी----जिंदगी से मुलाक़ात हो गई 

मेरी नज़रों में खुद के लिए बेगानापन देख 
वो --तिलमिलाई 
संयम को परे हटाकर 
जोर से चिल्लाई --

अजीब अहमक इंसान हो तुम निशा 
उसके दिल में मेरे लिए था 
केवल और केवल गुस्सा 
तुम्हारी विचित्र हरकतें कभी-कभी बन जाती है मेरे लिए 
एक पहेली ----

क्यों बेगानापन दिखला रही हो जबकि 
हम  हैं एक-दूसरे की  सहेली 

सहेली और तुम ?
मैं भी  कहाँ अपने पर नियंत्रण रख पाई औ --
मान-मनौवल को परे हटाकर 
धीरे से गुर्राई 

सहेली होने के नाते तुम 
कब ?कहाँ?और कैसे ?
मेरे दुःख को बाँटती हो ?
बहुत हीं कमजोर इंसान हो तुम --जो--
विधाता के इशारे पे नाचती हो 

दोस्त कहकर दुश्मनों सा व्यवहार करती हो 
सँभलने का मौक़ा दिए बिना 
पीछे से वार करती हो ?

जब से होश सम्भाला 
रूप देखा तुम्हारा बड़ा अनोखा 
एक  पल विश्वास दिला 
दूसरे हीं पल तुम दे देती हो धोखा 

तुम्हारॆ इस व्यवहार से 
आ गई मैं तंग 
टूटे विश्वास के साथ  बोलो 
कैसे चलूँ मैं संग ?

खैर ! चलने का नाम हीं है जिंदगी 
पर भूले से भी ना सोचना 
करुँगी तेरी बंदगी 

तुम अगर मजबूर हो तो 
मैं  भी मगरूर हूँ     
  तुझे   औरों पे होगा पर मुझे--
 खुद पे गुरुर है ---

तेरा काम तुम करो 
मेरा मैं  करुँगी 
जब भी मौका आएगा मैं तुमसे क्या ?
खुद से भी लडूंगी---