ज्यों हीं शाखों पर बंद कलियों ने अपनी आँखें खोली ......
शहद भरे मीठे शब्दों में
कोयल कुहू -कुहू बोली ......
झूम उठी है निशा सुहानी
आया नया सबेरा
चलो सखी अब आम्र कुञ्ज में
डाले अपना डेरा .....
दो पथिक मिले
एक राह चले
दो सपनों ने ली थी अंगडाई ...
आज उन्हीं को साथ लिए
ये शाम मस्तानी आई .......
शाखें सजती जैसे गुलमोहर की
सुर्ख फूलों की लाली से
सज़ा रहे उन पथिकों का जीवन भी
एक दूसरे की परछाईं से ......
खुशियाँ बाँटों
खुशियाँ पाओ
उलझन को
मिल-जुल सुलझाओ ......
बीत गए कुछ समय पुराने
आनेवाले भी बीत जायेंगे
इन राहों पर चलते-चलते
मंज़िल पर छा जायेंगे .....






