Tuesday, 24 January 2012

सागर का दर्द


बरसों से मिलने की आस लिये बैठा हूँ
इंतजार की आग में पल-पल जला करता हूँ
ख्वाबों से तेरे,दिल को बहलाये रहता हूँ
सागर हू फिर भी, मैं प्यास लिये बैठा हूँ ।


इठलाती नदियाँ औ बलखाती तालें हैं
सतरंगी सपनों का संसार लिये फिरता हूँ
तेरे दरश को पलक बिछाये रहता हूँ
सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ।


विरह में  मैं पागल, दिवाना मैं घायल
सीने में अपने हलचल दबाये रखता हूँ
मौन की अनुगूँज में खुद को डूबाये रखता हूँ
सागर हूँ फिर भी, मैं प्यास लिये फिरता हूँ।


खुद का सुधबुध औ चैन गँवाये बैठा हूँ
लहरों की तरंगों में गम को छिपाये बैठा हूँ
नैंनों से अपने मैं,नींद भगाये रहता हूँ
सागर हूँ फिर भी,मैं प्यास लिये बैठा हूँ

Monday, 23 January 2012

उपलब्धि


करती हूँ एक प्रश्न सखी ........
करना तुम मत शोर 
बेचैनी घिर आई है 
अंधेरा घनघोर .
किसने तुमको राह बताई 
किसने दिया सहारा ?
या खुद ही मंजिल को ढूंढा.....
सारा श्रेय तुम्हारा ?
आगे बढती धारा का जब कोई 
मार्ग अवरुद्ध करता होगा ......
सच बतलाना आली मुझको ......
क्या दिल तेरा चुपके -चुपके ......
रोता होगा ?????????
फिर भी तुमने हार  न मानी
वो स्वाभिमानिनी निर्भय तरंगणी....
 प्रगति औ प्रवाह अपना कर
स्वच्छ हमेशा रहता तेरा पानी .....
कभी ऊँचे से नीचे बहती 
कभी  नीचे से ऊँचे बहती 
रोते हँसते गाती गाना 
तेरे जीवन की उपलब्धि का ?
क्या है वही भेद पुराना ..........


ये कविता ८-१० साल पहले की  लिखी हुई है .




Saturday, 14 January 2012

मेरी जरूरत हो तुम .......

आज मेरी बिटिया ईशा  महाराणा  का जन्मदिन है .१५ जनवरी १९९२ शाम ७.२५ दिन बुधवार का था .....जब उसने मुझे माँ बनने की अनुभूति से रूबरू कराया था. सच सृजन का सुख अदभुत एवम अनोखा होता है जिसे सारी माएं ही महसूस कर सकती है .......आइये अपनी उस अनुभूति से आप सभी को अवगत कराऊँ ......


आज ही के दिन मेरी बगिया में
कोयल गुनगुनाई थी
बनकर नन्ही सी परी
मेरी गोद में जब तुम  आई थी
ऐसा लगा था...............
सारे जहाँ की खुशियाँ
मेरे आँचल में समाई थी ....


 मेरे इन्द्रधनुषी जीवन के
सात रंग हो तुम
मेरे जीवन संगीत की
सुर सात हो तुम
मेरे दिल की धडकन
नैनों की ज्योति  हो तुम
एक प्यारी चंचल हिरनी  सी ....
ममता की मूरत हो तुम
तुम्हें पता नहीं पर .....
मेरी जरूरत हो तुम......


मेरे सहमे हुए दिल को जब .....
 हिम्मत बंधाती हो तुम
तब बिटिया नहीं बल्कि
माँ के रूप में नजर आती हो तुम .....

तुम्हारे जन्मदिन पर ....
मेरी यही है शुभकामना ...
दुनिया बदल जाये पर ........
तुम न बदलना
सुख औ दुःख को
समभाव से ग्रहण करना
याद रखना .........


जीवट इन्सान कभी
दुःख से बिखरता नहीं
दुःख से जो निखरता
है जीवट इन्सान वही........


जब भी मुश्किलों में हो
मुझे याद कर लेना
माँ का दंड समझ
उसे आत्मसात कर लेना
देखना तुम्हें अपनी राह
स्वंय मिल जाएगी
भले ही दूर हो मंजिल
पर वो खुद ही चलकर
तेरे पास आएगी ......
तेरे पास आएगी .....




Wednesday, 11 January 2012

कही-अनकही

जरुरी नहीं की .........
हर बात का जबाव दिया जाये
भीड़ में बहुत जी लिया ......
अब तन्हाई का भी .....
मजा लिया जाये .....

वो हिम्मत ही क्या ?
जो टूट जाये .....
वो आस ही क्या ?
जो छूट जाये ....
वो दोस्त ही क्या ?
जो रूठ जाये ........



Friday, 6 January 2012

यादें

आज मेरी माँ  की पुण्यतिथि है .माँ की  यादों से दूर जाना नामुमकिन है उनके विदाई की पीड़ा को भी व्यक्त करनाआसान नही .बस एक छोटी सी कोशिश.

बहुत दिन बीते ,रातें बीती
यादों का पल भारी है
आज भी मन के वीरानों में
यादों का बहना जारी है .

यादें मेरे बचपन की
यादें तरुणाईपन की
 यादें तेरी जुदाई की
यादें तेरी विदाई की .

शब्द खो गये सचमुच मेरे
दुःख -दर्द भंवर अभी  जारी है
रूप दे सकूं कैसे मै ?
पल -पल मुझ पर भारी है .........
भूल जाऊं कैसे उस पल को ?
जो याद तुम्हारी दिलाती है ......
बिखरे -बिखरे सपने मेरे
मजबूरी पर रोती है
जाते -जाते तुमने आवाज बहुत ही दिया
माफ करना माँ मुझको
मैंने   ही नजरंदाज किया .

सोते -जगते ,उठते -बैठते
याद तुम्हारी आती थी
सोच -सोच के सचमुच मेरी
आँखें भर -भर आती थी
नींदों में भी कोई ताकत
आकर मुझे जगाती थी
सपनों में तेरी परछाई
आकर मुझे बुलाती थी
सुन लेती थी ,समझ गई थी
तेरा साथ छुटनेवाला है
गागर मेरी ममता का
जल्द ही फुट्नेवाला है ........
इंतजार मत करना वर्ना ........
शोकमय हो जाउंगी
काम खत्म होते ही माँ ....
मै तुमसे मिलने आउंगी .

वैसे मुझे माँ से बिछुड़े एक दशक ही हुआ है पर लगता है की सदियाँ   बीत गई है .

Thursday, 29 December 2011

मैंने मौत को देखा है

ब्लोगर्स साथियों  आप सबको नव वर्ष की बहुत-बहुत शुभकामना....
आइये आज मै आप सबको अपने जीवन का वो अनुभव बताउं जिसे पूरा हुए सात साल हो गये |
२९ दिसंबर २००४ को मेरे ब्रेस्ट केंसर का आपरेशन हुआ था ........उस अनुभव को आप सबसे शेयर
करने का आज मौका मिला है | वैसे भगवान की कृपा से मै  स्वस्थ्य हूँ और आगे भी भगवान की ही
मर्जी |



आज भी मेरे मन मस्तिष्क पर
आश्चर्य एवम भय मिश्रित रेखा है
जबसे मैंने अपने आसपास
मंडराते मौत को देखा है !

मरने से नही डरती हूँ
खुद के गम को हरती हूँ
लम्बी आहें भरती हूँ
झरनों जैसी झरती हूँ
पल पल खुद से लडती हूँ
खुद को देती रहरहकर
विश्वास भरा दिलासा
नही है मकडजाल मेरा
न ही है कोई धोखा
जीना कुछ कुछ सीख गई हूँ
जबसे मौत को देखा है |

मौत को सामने देख कर मै ...........
ठिठक गई थी..... मेरी सांसे ........
मेरी जिन्दगी...... थम सी गई थी
मुझे यूँ घबराया देख
वो मेरे सामने आई ........
मेरे सहमे हुए दिल को
प्यार से सहलाया औ ...समझाया ...
जीवन औ मौत तो
जन्म -जन्मों के मीत हैं
समझ लूँगी इन बातों को
सचमुच जिस दिन
उस दिन होगी मेरी जीत
जन्म औ मृत्यु है ऐसे
जैसे पी संग प्रीत |

मैंने मौत की आँखों में झांकते हुए कहा .......
महानुभाव! मै आपको अच्छी तरह जानती हूँ
आपके आने के कारणों को
अच्छी तरह पहचानती हूँ
आपकी वजह से मैंने बड़े से बड़ा .....
दुःख सहा है पर ........
याद करें क्या  मैंने  ?
कभी आपको उलाहना दिया है ?
अपनों के मौत की पीड़ा
क्या होती है ......
मौत होने के कारण
क्या आपने इसे कभी सहा है ?
मै मौत से नही डरती
आपको देखकर लम्बी आहें
नही भरती ......
डरती हूँ तो सिर्फ औ सिर्फ .....
अपनों से बिछुड़ने  की पीड़ा से
ये सोचकर की मेरे बाद
मेरे बच्चो का क्या होगा ?
जो सपने मैंने उनके लिए बुने हैं
उन सपनों का क्या होगा ?
मौत बड़े प्यार से मेरे पास आई
आँसू भरे दो नैनों को
आँसुओ से मुक्त कराया औ कहा...........
मै भी इतनी निर्दय नही हूँ ....
दुःख तो मुझे भी होता है
जब साथ किसी अपनों का छूटता है
पर !मै अपने दिल का दर्द
किसे बताउं ........
अपनी जिम्मेदारियों से कैसे
भाग जाऊ?
मै जानती हूँ
माया मोह के  बंधन को तोड़ने में
वक्त तो लगता है .....
अधूरे सपनों को मंझधार में छोड़ने में
दर्द तो होता है |

मैने मौत से आग्रह किया ........
गर आप मेरे दुःख से दुखी हैं
तो  .......मेरे ऊपर एक  एहसान  कीजिये
ज्यादा नही पर इतना वक्त दीजिये
जिससे मै अपने अधूरे काम निबटा सकूँ
उसके बाद आप जब भी आयें मै .....
ख़ुशी-ख़ुशी आपके साथ जा सकूँ
पलक भर के लिए उसने मुझे देखा
फिर मन ही मन कुछ बोली औ कहा .......
जिजीविषा  औ विजिगीषा की पहचान हो तुम निशा ......
आशा औ विश्वास की खान हो तुम निशा
मै तुम्हारी नही तुम्हारे विश्वास की कद्र करती हूँ
अपने आधे अधूरे कार्य को पूरा कर सको
मै तुम्हे इतना वक्त देती हूँ ......
मौत से मिले इस उधार  वक्त की
कीमत मै जान गई हूँ
जीना किसको कहते हैं
इसको कुछ -कुछ जान गई हूँ |


Friday, 23 December 2011

अपनापन

अपना कभी  अपनों  से
रूठ नही सकता
नींद  औ सपनों का रिश्ता
टूट नही सकता ........


एक दूसरे का साथ
विश्वास से चलता है 
बेगानों की दुनिया में  भला  कहाँ ?
अपनापन  मिलता है ..........



दुःख  मुझको  देकर  सोचो  भला .........
तुमने क्या पाया ?
उतना ही तुम भी दुखी हुए
जितना  मुझको तडपाया........



लाख कोशिश  करे पतझड़
बहारें  फिर भी आय़ेगी
उदासी भरे पल हो या ........
खुशियों भरी  शामें
जब -जब साँझ  ढलेगी
तुम्हें मेरी याद सताएगी ...........

लाख गम हो मुकद्दर  में निशा के ......
वो फिर भी खिलखिलाएगी .....
वो फिर भी खिलखिलाएगी ........