Saturday, 10 September 2011

कीमत


जो होता है
अच्छा होता है
जो खोता है
वही रोता है
जो खोयेगा ही नही तो ?
रोने की कीमत समझेगा कैसे ?
जो टूटेगा ही नही तो ?
जुडने की कीमत समझेगा कैसे
उदासी की जब नही पडी तो ?
मुस्कान की कीमत क्या वो समझे ?
दिल से नही जुडा है जो
अपनेपन की कीमत क्या वो समझे ?
मान नही मिला हो जिसको
अपमान की कीमत क्या वो समझे ?

Friday, 9 September 2011

उसकी यादें



मेरी बिखरी-बिखरी सी यादें
मुझे छोडकर तुम
कहीं और चली जाओ
मेरे लौहखंड से बने
इरादों को यूँ कमजोर न बनाओ
दुनियाँ से जाने के पहले
बहुत कार्य है निबटाने को
क्या मैं हीं हूँ इकलौती ?
अपना अस्तित्व मिटाने को ?
जब कोई मेरी परवाह नहीं करता ?
तो ? मैं क्यों करुँ किसी की परवाह ?
क्यों निकालूँ किसी के लिये
दिल से कोई आह ?
अच्छा होगा


बेदर्दों से दूर रहकर
मैं अकेली ही चलती चली जाऊँ
अपनी मर्जी से रोऊँ या गाऊँ
तुमको तो पता है ?
आत्मा तक पहुँचने का
दिल है एकमात्र रास्ता
पर ? जो दिल से नहीं जुडा है
उसका मुझसे क्या वास्ता ?
अच्छा यही होगा
तुम मुझे उसकी याद न दिलाओ
जैसे उसने भूला दिया मुझे
वैसे मुझसे उसकी यादें भी ले जाओ ।


Monday, 5 September 2011

माँ


माँ-मैं खग थी
तुम थीं मेरी दोनों डैने
तुम जैसी माँ पाकर
जीत लिया जग मैने
बिना मिले तुम चलीं गईं
मजबूरियों पर रोती हूँ
सपनों में आकर मिल लेती हो
जब भी मैं दुःखी होती हूँ
साथ तुम्हारा छूटा जबसे
द;खों के झोकों में
झूल गई
तेरे बिन माँ मैं अपने
घर का रास्ता भूल गई।

गुरु


गुरु केन्द्र है ग्यान का
करे व्यक्तित्व निर्माण
गुरु की महिमा का न कोई
कर सकता बखान
गुरु है तो राष्ट्र है
गुरु बिना सब सुन
गुरु बिना न मुक्ति मिले
इन्हें सोच-समझकर चुन।

प्यार क्या होता है?


कल पर विश्वास नही होता तो ?
आज नही होता
प्यार कभी दूरियों का
मोहताज़ नही होता
किसने जाना ? किसने समझा ?
प्यार क्या होता है ? बिना दिये कुछ ?
मिले हमेशा प्यार वही होता है।
नेह का नाता उम्र भर साथ निभाता है
देह का नाता हमेशा धोखा दे जाता है
वासना,व्यभिचार औ रिश्तों के व्यापार से
झूठ, फरेब औ बनावटी व्यवहार से
मुक्त होता है प्यार।
प्यार की कोई परिभाषा ?
कोई सीमा नही होती
ये दिल का चैन औ
नैनों की है ज्योति।

Thursday, 1 September 2011

ऐसी खुशियाँ कब माँगी थी ?


जीना-मरना एक समान हो
रोने-गाने में भेद नही हो
जीवन का मँझधार जहाँ हो
डुबी नाव पतवार नही हो
माँझी भी अड-अडकर जहाँ पर
बनते हों अभिमानी
सच बता दो मुझको भगवन
ऐसी खुशियाँ कब माँगी थी ?

जीवन का अस्तित्व मिटाया
अरमानों का गला दबाया
बनी समर्पण की ही छाया
तब सुख का दिन था ये  आया
सुखमय भरे दिनों मे भला
बन बैठा कौन वरदानी ?
वर देने के बदले डँस रहा सुख को
ऐसी खुशियाँ कब माँगी  थी ?


पीर बन गया पर्वत अब तो
बरगद सी व्याथायें
सिसक- सिसक कर मन भी
अब तो ,कहता करुण कथायें
भूलना चाहूँ भूल न पाऊँ
किसकी है ? मनमानी
एक पल अब तो एक युग लगता
ऐसी खुशियाँ कब माँगी थी ?


दुख के दिन हैं कट जायेंगे
गम के बादल छँट  जायेंगे
दूर करुँगी दुःख-दर्दों को
अपनी त्याग-तपस्या से
नहीं डरूँगी-नही हारुँगी
ऐसी हूँ स्वाभिमानी
पा लूँगी उन खुशियों को भगवन
जैसी तुम से है माँगी।

तीनों पागल है


ये घटना १९८७ या १९८८ की है।लगातार बारिश हो रही थी।
मेरे गाँव रसलपुर,नौगछिया,भागलपुर के लोग आश्वत थे कि
इस बार बाढ नही आयेगी क्योंकि सामान्यतः बाढ तब
आती थी जब नेपाल के किसी बाँध का फाटक खोला
जाता था, ऐसा ही हमारे बडे-बुजुर्ग कहते थै। पर उस
समय शायद कुछ नये बाँध और बनाये गये थे। अतः
सभी निश्चित थै।उनमें मेरे पिताजी स्वर्गिय श्री रघुवीर यादव
एवं मेरे जीजाजी श्री रणविजय कुमार भी शामिल थै।
जिन्हे विश्वास था कि बाढ नही आयेगी।
पर मैं, मेरी माँ स्वर्गिय तिलेश्वरी देवी एवं मेरी दीदी
श्रीमति शांति सिन्हा ने उनके मना करने के बाबजूद
घर का सामान व्यवस्थित करना शुरु कर दिया था।
हम तीनों रात भर जग सामान जमाते रहे।पलंग,चौकी,
अलमारी,टेबल सभी को पाँच ईटों पर रखा क्योंकि
खिडकी के आर-पार बहता था।घर का सामान जमाने के
बाद हमने भूसा घर की ओर रूख किया
तब सुबह के पाँच बज गये थै। मैंने सुना-जीजाजी, पिताजी
से कह रहे थै-ये तीनों रात भर से जग कर सामान जमा
रही हैं।पिताजी बोले-एक पागल हो तो उसे समझाया
जा सकता है।यहाँ तो तीनों पागल है।अचानक पानी गिरने
की आवाज आई और देखते-देखते खेतों से बहता हुआ हमारे
घर मै घुस गया।अब हमारे होंठों पर विजयी मुस्कान खेल
रही थी।पिताजी और जीजाजी भी मुस्कुराते हुये बोल
रहे थे कि अच्छा हुआ जो तुमने हमारी बात नही मानी।
बाढ आने बाद हम अंबिका चाचा के यहाँ रहने चले जाते थै।
बडा मजा आता था। सभी मिलजुल कर रहते थै।
तकरीबन बारह परिवार होते थै।आज भी वो सारी
बातें मेरे मानस पटल पर अंकित है।पर अब न तो वे लोग
रहे न हीं पहलेवाला वो अपनत्व।इस बात का दु;ख अवश्य है।